Monday, June 2, 2008

चींटियाँ

चींटियाँ  

चढ़ रही हैं लगातार
दीवार पर बार-बार
आ रही हैं 
जा रहीं हैं 
कतारबद्ध चींटियाँ

ढो रही हैं अपने घर का साजो सामान
एक नए घर में
आशा और उम्मीद के साथ
गाती हुई
ज़िन्दगी का खूबसूरत तराना
इकट्ठी करती हुई
ज़रुरत की छोटी से छोटी
और बड़ी से बड़ी चीज़
बनाती हुई गति और लय को
अपनी जिंदगी का एक खास हिस्सा

अपने घर से
विस्थापित होती हुई चींटियाँ
चल देती हैं नए ठिए कि तलाश में
किसी भी शिकवा शिकायत के बगैर

पुराने घर की दीवारों से गले लगकर
रोती हैं चींटियाँ
बहाती नहीं हैं पर आंसू
दिखाती नहीं हैं आक्रोश
प्रकट नहीं करती हैं गुस्सा
जानती हैं फिर भी प्रतिरोध की ताक़त

मेहनत की क्यारी में खिले फूलों की सुगंध
सूंघती हैं चींटियाँ
सीखा नहीं है उन्होंने
हताश होना
ठहरना कभी
मुश्किल से मुश्किल समय में भी
उखड़ती नहीं है उनकी साँस
मसल दिए जाने के बाद भी
उठ खड़ी होती हैं चींटियाँ
लगे होते हैं उनके पैरों में डायनमो
चलते रहने के लिए
बढ़ने के लिए आगे ही आगे
पढ़ती हुई हर खतरे को
जूझती हैं चींटियाँ

जानती हैं वो आज़माना
मुट्ठियों की ताक़त को एक साथ!!

रचनाकाल : 5 सितम्बर, 2003

Tuesday, April 15, 2008

नन्हे हाथों में रोशनी

नन्हे हाथों में रोशनी
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चल नहीं पा रहा है
लंगड़ा रहा है
पैर में पुलटिस बांधा हुआ
बारह-तेरह साल का
नंगे पांव लड़का
बेंड बजाते
नाचते गाते
झूमते इठलाते लोगों
को घेरकर
सर पर लादे हुए है
बिजली के तारों से जुड़े हुए
ट्यूब लाइट्स का बोझ
दर्द से कराह कराह जाता है
होठों को दबा लेता है
अपने दांतों से
टीस न आ जाए कहीं बाहर
लड़खड़ाते क़दमों को सॅंभालता है
नंगे पांव चल रहा लड़का
सर से उतारकर
अपने क़द से भी लंबी ट्यूबलाइट्स को
कभी रखता है वो
दाएं तो कभी बाएं कंधे पर
रोशनी को सॅंभाले रखने के लिए
दूसरों को बचाने के लिए अंधेरे से
बारह तेरह साल का वह लड़का
चल रहा है बारातियों के साथ
बचपन को ठेलते हुए आगे ही आगे
उसकी आंखें
टिकी हैं
नाचने गाने वालों से ज़्यादा
दस रुपये के नोट और खाने पर
मेहनत के फूलों की सुगंध
बेहतर भविष्य का सपना दिखाती है
चाहें तो आप
भी हो सकते हैं शरीक़
इस नज़ारे को देखने के लिए
असमानता की विडंबनाओं की बारीक़ी
भी यहां आपको आएगी नज़र
जहां सरकारी तंत्र
अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है
बाल कल्याण विभाग के
अधिकारी के बेटे को
घोड़ी पर बैठे देख सकते हैं आप शान से
जिसके पीछे की पंक्ति में
चल रहे हैं बड़े बड़े क़ानूनविद
अपनी पत्नियों के साथ
चौडे़ होकर
अपने पूरे रौब और पूरी गरिमा के साथ
चिपकी हुई है जो
उनकी खाल में एक तिल की तरह
चंद क़दमों की दूरी पर
लड़खड़ाता लड़का
कसकर थामे रहेगा
अपने से दूने बोझ को
और चलता रहेगा ऐसे ही
किसी फ़िल्मी गाने पर
झूमने की इच्छा को दबाए हुए अपने अंदर
मुंह फाड़-फाड़कर
देख रहा है
लंगड़ाता हुआ लड़का
सहते हुए घुड़की
आगे और पीछे के
अपने हमपेशा 
ट्यूब लाइट्स पकड़ने वालों की
उसे मालूम है
आएगा अभी थोड़ी देर में
ठेकेदार
मारेगा ठोकर
देगा एक भद्दी गाली
अपने अंदर के पीव को
निकलने नहीं देगा बाहर
सहलाऐगा अपने अंदर की इच्छाओं को
लंगड़ाता हुआ बारह तेरह साल का लड़का
थामी हुई है आख़िर उसने
अपने नन्हें कमज़ोर हाथों में रोशनी
उन मज़बूत हाथों के बीच
गाते हैं जो क़दम-क़दम पर
अंधेरी दुनिया का गीत
देख पा रहे हैं क्या आप
उस लड़के के बिखरते क़दमों की थरथराहट
जो स्कूल जाने की बजाय
संस्कृति के कुछ और ही मायने सीख रहा है
ठहरिए,
वो अब गिरने को है
थाम सकें तो थामिए
उसकी रोशनी को जनाब
कीजिए उसे आज़ाद
उसी रोशनी के लिए
जिसे थामे हुए है वो दूसरों के लिए!
07/04/2008