Thursday, February 27, 2020

हिटलर मरा नहीं


हिटलर मरा नहीं
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अशोक तिवारी 
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हिटलर मरा नहीं
हिटलर मरते नहीं
आवाजाही करते हैं इतिहास के पन्नों में
परिवर्तित होते हैं
एक रूप से दूसरों में

एक मुल्क में ही नहीं
दुनियाभर में करता है सैर हिटलर
नहीं है जिसकी कोई एक शक्ल-ओ-सूरत
तमाम मुखोंटों के साथ
आता है वो हमारे सामने
काल और समय से परे
वो अमर है- अजर है
अवतार है
अन्तर्यामी है
वो यहाँ भी है - वहां भी है
इधर भी है -उधर भी है
स्वर्ग में भी-नरक में भी
ज्ञानी है - ध्यानी है
वो सबसे बड़ा इतिहास वेत्ता है
मनो विज्ञानी है
मौसम विज्ञानी है
शिक्षा शास्त्री - वैज्ञानिक है
लेखक है, कवि और शायर है
वो क्या क्या नहीं है ....

किसी एक मुल्क में नहीं...
वो बढ़ा रहा अपना पंजा
दुनियाभर की उन सारी जगहों पर  भी
जानी जाती हैं जो
लोकतंत्र के लिए,
भाईचारे, सुकून और चैन-ओ-अमन के लिए
उसी तरह जैसे
हिंदुस्तान की सरजमीं पर
नजर आया था सदियों पहले
तबाही के भीषण मंज़र के साथ
पुष्यमित्र शुंग..     

हिटलर मरा नहीं
हिटलर मरते नहीं
आवाजाही करते हैं इतिहास के पन्नों में
ज़बरदस्ती
अपनी उपस्थिति दर्ज कराने
आत्महत्या तो महज़ छलावा था
झूठ था उसी तरह
बोलता रहा जिस तरह वो ताउम्र
दुश्मनों के लिए
बो दिए विष-बीज जिसने
अपनी महानता के गीत गाते हुए
हो सकें ताकि दुश्मन नेस्तनाबूत
दुश्मन जो
नफ़रत से परे
प्यार-मुहब्बत और ख़ुलूस की बात करता है
दुश्मन जो
रंग-बिरंगे फूलों को खिलाने की बात करता है
असहमति की बात करता है
संविधान की बात करता है
दुश्मन जो
गोली की एवज़ में
पत्थर चलाने की बात करता है
तिरंगे में खुद को लपेटकर
बचाने की बात करता है
गंगा-जमुनी तहजीब की बात करता है
हिंदुस्तानियत की बात करता है

हिटलर मरा नहीं
हिटलर मरते नहीं
हिटलर मरेंगे भी नहीं
वो रहेंगे हमारे आसपास
चौकन्ना रहना होगा
हम दुश्मनों को
आवाजाही करते इतिहास के पन्नों में दर्ज़
इन किरदारों से
उनकी मीठी नज़र और विषपान से  
छलावों और कुटिल मुस्कान से !!

  ~ 14/01/2020

Monday, January 18, 2016

एकलव्य

एकलव्य
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एकलव्य
चुनौती बनकर सामने आया
द्रोणाचार्य वर्ण सत्ता की
कुलीन व्यवस्था की ईंटों को
चिनते हुए
तिरछी निगाहों देखते रहे

एकलव्य ने धनुष-कमान को हाथ लगाया
सर नवाते हुए
शिक्षा याचना की गुरु से
देते हुए राजतन्त्र की दुहाई
भोंहें तरेर दीं द्रोणाचार्य ने
शापित किया
धमकी दीं
और चढ़ते रहे सूरज की ऊंचाई......

एकलव्य ने घने जंगल में शरण ली
पहाड़ों को थामे हुए कन्धों पर
परिवार, कर्तव्य, सपने और जूनून को
सँजोए रखा
और एक दिन प्रकट हो गया
व्यवस्था के सूरज के विरोध में

महत्वाकांक्षा
अपनी जड़ें तक भुला देती है

नैतिक बल पैदा करता है
हमारी रीढ़ में ताक़त

लोभ-प्रलोभन का तिरस्कार
मदद करता रहा
एकलव्य को
सीधे और तनकर खड़े होने में

निरंतर अभ्यास
किसी को भी चोंका सकता है
हिला सकता है किसी की भी चूल्हें
कुलीन तंत्र की दुहाई में
खड़े हो गए द्रोणाचार्य
जो विकल थे
एकलव्य की प्रत्यंचा पर चढ़े तीर को देखकर
याद दिलाई उन्होंने
गुरु परम्परा को निभाने और न निभाने की शर्त
पांडित्य और राजपाट छूट जाने के डर में
मामूली ख़तरों का आभास भी
कमज़ोर बना देता है

एकलव्य का अँगूठा काटा गया
द्रोणाचार्य ख़ुश हुए
कमज़ोर हुई मगर सच की प्रामाणिकता

एकलव्य सौदागर नहीं
ज़िंदगी के कारोबार में
खुद की बाज़ी लगाने वाला
एक इन्सान था  
जो चनौती बनकर
सामने आता है
ज़िंदा रहती है जिसके बल पर
मानवीयता
हर युग में

हर दौर में ......!!    

अंधी गली का मुहाना

अंधी गली का मुहाना
ये कौन सी गली में आ गए हम
कौन सी वादियों में घिर गए
कि कुछ सुझाई नहीं देता?
साँस ही नहीं ली जाती
ये कौन सा रास्ता है
जो अंधी सुरंग को जाता है? 

ये कौन हैं
जो साए बनकर घूमते हैं इर्द-गिर्द
जो क़दम क़दम पर डराते हैं
धमकाते हैं
ज़िन्दगी का वास्ता देते हैं?
ये कौन हैं जो
ज़िन्दगी को ही दांव पर लगाते हैं
और ठहाका लगाते हुए
एक दिन तमंचे की गोली से
सामने वाले की आवाज़ को
हमेशा के लिए बंद कर देते हैं?

कौन सी अंधी गली का मुहाना है ये
जहाँ एक बच्चा
अपने बाप से मिलने को तरसता है
एक मां रोती है
काम पर गए अपने बेटे के लिए?
ये कौन सी गली है
जिसका कोई अंत नहीं है
ये कौन सा दयार है जहां
जहाँ एक मज़हब
दूसरे की खाल उतारने को है बेचैन?

क्या ये वही गली है
जिसका पता लेकर निकले थे हम
सालों पहले
सर पर टांगे हुए तमाम जोख़िम
थामे हुए ख़ून में लिसड़े बदन
और घायल सरों को
चलते रहे बेख़ौफ़
क्या इसी तंगदिली और अधेरे के लिए?   

ये कौन सी अंधी गली में आ गए हम
जहाँ भाईचारा सिसकियाँ भरता है
सूनी आँखों में उम्मीद की एक किरन लिए
जहाँ रौशनी जूझती है
अपने अस्तित्व के लिए
मिचमिचाई आँखों से देखती है जो
इससे निकलने का रास्ता
और दम साधे रहती है
सबेरे के इंतज़ार में ......
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Sunday, March 10, 2013

पतंग पर सवार


रेखाचित्र -

पतंग पर सवार 

अशोक तिवारी

उस दिन सुबह से ही मन में एक उल्लास था। स्कूल की गर्मी की छुट्टियां हो गई थीं। बाबूजी आज गांव जा रहे थे। गांव से मतलब पैत्रिक गांव। और जहां से उसी दिन तो वापस नहीं आया जा सकता था। अतः उस दिन हमें घर में छूट मिलेगी, यह सोचकर हम सब भाई-बहिन ख़ुश थे। बाबूजी का गांव जाना और ख़ासतौर से घर से रात भर के लिए कहीं भी बाहर जाना हम सब बच्चों के लिए एक राहत की बात हुआ करती थी। निश्चय ही आप सोचेंगे कि आख़िर ऐसा क्यों था। इसी बात का जवाब ही तो है, जिसे मैं ढूँढ़ने के लिए आज बैठा हूं। बाबूजी घर में रहते तो महसूस होता कि माहौल में एक घुटन तारी हो रही है, धड़कनें एक अनुशासन में धड़कने के लिए बाध्य हैं। न कम न ज़्यादा। बाबूजी के घर से बाहर रहने को हम सभी सेलीब्रेट करते। इसमें हम भाई-बहन तो होते ही थे, कुछ हद तक मां भी शरीक़ हो जाती। कई बार बाबूजी का बाहर जाने का कार्यक्रम काफ़ी पहले बन जाता तो हम सब उनके उस दिन का इंतज़ार करते। इस बात का अर्थ ये कदापि न लगाया जाए कि हम सब भाई बहन या मां बाबूजी को नहीं चाहते थे। बल्कि यहां एक विरोधाभास था जो हमारे साथ अक्सर चलता था। बाबूजी जब घर में नहीं आते तो लगता कि घर अधूरा है, मगर जब बाबूजी आ जाते तो लगता कि हमारी स्वतंत्रता में दख़ल हो गया। बाबूजी का डर इस क़दर था कि हम न तो ख़ुलकर बात कर सकते थे और न ही ख़ुलकर अपनी बात कह सकते थे। हमारे उठने-बैठने, चलने-फिरने पर बाबूजी की पैनी नज़र होती। कोई कुछ कह नहीं पाता था। बाबूजी की घर में उपस्थिति हम सबको अलग-अलग धड़ों में रहने को बाध्य करती थी। मैं आमतौर पर छोटी बहिन के साथ ही घर के किसी कोने में किसी ऐसे खेल में लगा होता जो चुपचाप खेला जा सकता हो, या फिर अपनी किताब-कापियों में मुँह गढ़ाए रहता था। बाहर कहीं खेलने जाना होता था तो बाबूजी की नज़र बचाकर घर से निकलना होता था। कई बार ऐसे में बहाना भी काम कर जाया करता था। जैसे पेशाव जाने के बहाने हम बाहर भाग जाया करते थे। अब क्योंकि पाखाना तो अमूमन घर के बाहरी हिस्से में ही होता था, तो कोई कहां तक नज़र रख सकता था। घर से छूटे तो पहुंच गए खेल के मैदान में, जहां खेल की टीम या तो हमारा इंतज़ार कर रही होती थी या फिर हम उसमें अपनी जगह बनाने के लिए लाइन में लग जाते। मुसीबत तो तब होती थी जब पहले से ही तय खेल में मैं समय से नहीं पहुंच पाता था। झूठ बोलकर घर से निकलकर जाना मेरे लिए वाकई कष्टकर होता था। जिसका एक तनाव मेरे अंदर बराबर बना रहता था जो मुझे इस बात का अहसास कराता था कि मैं कुछ ग़लत कर रहा हूं। मगर मैं पाता था कई बार उसके बग़ैर बात भी नहीं बन पाती थी। 

इस तरह से खेल के मैदान में जाना भी मेरे लिए ज़्यादा कारगर साबित नहीं होता था। कारण - मेरा एक मन तो इस बात पर अटका होता था कि मैं घर में झूठ बोलकर आया हूं। और उस झूठ का सामना मुझे घर जाकर फिर से करना होगा। अतः मैं न तो खेल में पूरी तरह से दिलचस्पी ले पाता और न ही मैं वहां जाने से रुक पाता। जिस दिन बाबूजी शहर से बाहर कहीं जाते - मसलन आफ़िस के किसी काम से, जो ज़्यादातर चुनाव की ड्यूटी होती थी - तब मेरे लिए घर से निकलना बहुत मुश्किल नहीं होता था। और जब इस तरह का मौक़ा आता था तो हम फूले नहीं समाते थे। बहरहाल बात आगे बढ़ाएं -    

अब बाबूजी को गांव जाना तो था मगर दोपहर हो गई थी और अभी तक बाबूजी के जाने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। हम भाई-बहिन ने कई बार जाकर मां को इशारे-इशारे में कह दिया था कि बाबूजी वक़्त से ही निकल जाएं वरना फिर अँधेरा-वधेरा हो जाएगा तो दिक़्क़त होगी। बस नहीं मिलेगी। वग़ैरा वग़ैरा, जैसे हमें बाबूजी की इतनी फ़िक्र हो। मगर सच तो ये था कि हमें बाबूजी की फ़िक्र से ज़्यादा इस बात की फ़िक्र थी कि बाबूजी देर से गए तो हमने पतंग उड़ाने के जो मंसूबे बना रखे हैं, वो सब चौपट हो जाएंगे। बाबूजी के घर में रहते हमारे पतंग उड़ाने की छोड़ो, हम पतंग को घर में ला भी नहीं सकते थे। हम अपनी पतंगों को बुखारी में या छत पर बने टांड़ पर छुपाकर रखते थे ताकि उनकी कोई भनक बाबूजी को न लग जाए। 

मां ने बाबूजी से कई बार कह भी दिया था- ‘‘जानौंएं तो जल्दी निकर जाऔ, नईं तो देर है जाइगी।’’ 

दरअसल बाबूजी ऑफ़िस के किसी काम में लगे थे। उन्होंने काम निपटाते-निपटाते चार बजा ही लिए। और थैला उठाकर चल दिए घर से बाहर। मैं उनके क़रीब आया और पैर छूने के लिए झुका। घर में एक रिवाज़ था कि जब भी कोई घर से बाहर जाए या बाहर से आए तो बड़ों के पैर छूने होते थे। कारण क्या थे इसमें हम अभी नहीं जा रहे थे। फ़िलहाल पैर छूकर मेरे मन में इस बात पर पक्की मुहर लग गई थी कि बाबूजी आज तो लौटकर नहीं आएंगे। 

बाबूजी के जाते ही सबने के एक लंबी सांस ली, जैसे बहुत देर के बाद खुले में आए हों। मैं बुखारी में रखी अपनी पतंगों को निकालने के लिए घुसा। पतंगों की हालत अच्छी न थी। उन्हें चिपकाना था। लेई बनाई, कापियों में से पन्ने फाड़े और लग गए पतंगों की रिपेयरिंग में। मेरे साथ एक पड़ौसी दोस्त महेश आ गया था। वो दो दिन पहले मंजे और सद्दी ख़रीदकर लाया था - ख़ूब सारी और कुछ मंजा वो था जो मेंने अपने छत से दूसरों की पतंग कटने के बाद लूटा था। हुचका नहीं था मगर एक मोटी सी डंडी पर लपेट रखा था। पतंग और मंजा लेकर हम छत पर पहुंच गए। खुली हवा में सांस ली और पतंग में कन्ने बांधकर मंजे में गांठ लगा दी। 

थोड़ी ही देर में पतंग आसमान की सैर कर रही थी। मेरे हाथ का मंजा सरकता ही जा रहा था और पतंग लगातार लहराती हुई कभी इधर तो कभी उधर बढ़ती ही जा रही थी। पतंग के दूर जाने के साथ ही उसके धागे में भारापन आ रहा था। उसको साधने में अब ताक़त लगानी पड़ रही थी। मैं छत की ऐसी मुंडेर के बीचों-बीच खड़ा था जो दो छतों के बीच में बनी थी। और जहां से घर का मेन गेट भी साफ़ दिखता था। आसमान में पतंग उड़ रही थी और ज़मीन पर हमारे मन। पतंग जैसे-जैसे और जिस-जिस दिशा में मुड़ती हमारे शरीर भी उसी दिशा में मुड़ जाते। निगाहें बेहद तेज़ और ध्यान पतंग पर केंद्रित। 

किसी की पतंग हमारी पतंग के क़रीब आई। और हमारी पतंग को लभेड़ने की कोशिश करने लगी। मैं लिभड़ने या लिभड़ाने के मूड में क़तई नहीं था। वैसे भी अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे आसमान में उड़ती पतंग अच्छी लगती हैं मगर कटती हुई पतंग मुझे सदैव एक पीड़ा का भाव देकर जाती हैं। पतंग काटना मुझे किसी फूल को तोड़ने जैसा लगता है। वर्चस्ववादी सोच की मुख़ालफ़त मुझे सदैव भाती रही है। हालांकि महेश मुझे बार-बार उकसा रहा था कि मैं अपनी पतंग को बजाए पीछे खींचने के उस पतंग में लड़ा दूं। मगर इस बाबत मेरा फ़ैसला अटल था और मैं किसी भी सूरत अपनी पतंग को दॉव पर लगाकर उसे खोने के मूड में नहीं था। पतंग को उड़ाना और उसके साथ ख़ुद उड़ना एक अलग ही भाव होता है। पतंग तो बहुत से लोग उड़ाते है मगर ऐसे कितने हैं जो पतंग उड़ाने के साथ-साथ ख़ुद भी उड़ते हैं।
हमारी पतंग आसमान में दूर-दूर तक सैर कर रही थी। कभी ऊपर कभी नीचे। कभी दाएं तो कभी बाएं। मेरा शरीर भी ठीक उसी तरह मुड़ता जा रहा है। महेश के मुंह से लगातार आवाज़ें आ रही थीं। 

‘‘होए बेटा, शाबास बेटा...ओए खींच ले-खींच ले....ओए ढील दे-ढील दे।’’ 

और मैं सच बताऊं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पतंग ही को देख रहा था। जैसे पतंग नहीं मैं ख़ुद ही उड़ रहा हूं आसमान में। 

तभी एकाएक किसी परिचित आहट से मेरी निगाह घर के मेन गेट पर चली गई। मैंने जो देखा उससे तो मेरे होश ही उड़ गए। पतंग को साधने वाला मंजा हाथ से कब छूट गया, पता ही नहीं चला। बिना किसी सहारे के पतंग कहां गई, पता नहीं। सब कुछ छोड़-छाड़कर और एक अपराधबोध के साथ में धीरे-धीरे उन निगाहों का सामना करने के लिए छत से नीचे आ रहा था जो बाबूजी की थीं। 

जीने से नीचे आकर मैं स्वभाववश बाबूजी के पैर छूने के लिए झुका। मुझे नहीं पता कब बाबूजी ने मुझे उन्हीं पैरों से फ़ुटबॉल की तरह उछालकर दूर फेंक दिया। मैं सर के बल नल के पास गिरा। मैं पुनः चुपचाप और सज़ा मिलने के इंतज़ार में खड़ा था। बाबूजी की निगाहों की आग मेरे जिस्म को जलाकर खाक किए जा रही थी। 

सर में निकल आए गूमड़े को सहलाते हुए मां ने रात को बताया कि लेट होने की वजह से बाबूजी की बस छूट गई। अब अगले दिन सुबह जाने का उनका कार्यक्रम बन चुका था। और मैं सोच रहा था अब तो मेरे पास पतंग भी नहीं, मंजा या सद्दी भी नहीं। बाबूजी को पतंग उड़ाने से नफ़रत है या पतंग उड़ते हुए देखने से? क्या उड़ना कभी ग़लत भी हो सकता है? इसका जवाब मैं किससे पूछूं....तभी मेरा हाथ सर पर चला गया जो अब भी दर्द कर रहा था। क्षणभर को मुझे लगा कि काश बस वाले थोड़ा इंतज़ार और कर लेते तो आज की कहानी कुछ और ही होती। 

उस रात नींद की खुमारी में मुझे लगा कि बाबूजी मेरे नज़दीक आकर मेरे गूमड़े को सहला रहे हैं, उस गाल को भी जहां थप्पड़ लगे थे।                             
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09/03/2013

Wednesday, August 24, 2011

पहला अभिनय


पहला अभिनय
अशोक तिवारी
मैं हक्का-बक्का रह गया। हरप्रसाद मास्साब ने मुझे बुलवाया है? आख़िर क्यों? क्या सचमुच मुझे नाटक में शामिल कर लिया गया है? कैसे? यह कैसे संभव हुआ? मगर आज तो नाटक होना ही है। जो मास्साब कल तक मुझे हिकारत भरी नज़रों से देखते थे वो आज मेरे प्रति इतने नम्र और उदार कैसे हो गए? कल तक मुझे रिहर्सल देखने आने पर भी दुत्कार दिया जाता था।चल भागकहकर मुझे रिहर्सल के कमरे से निकाल दिया जाता था। यहां तक कि मास्साब की नज़रों में चढ़े कुछ लड़के मेरा पीछा करते और मुझे मेरी क्लास तक ही ठेलकर आते। मन मारकर मैं कुछ देर तो क्लास में बैठता; मगर मेरा ध्यान तो उन आवाज़ों की ओर होता जो रिहर्सल के कमरे से रही होतीं। विषयाध्यापक की नज़र बचते ही मैं फिर वहीं पहुंच जाता था।
आप भी सोच रहे होंगे कि मैं आख़िर कहां की और कब की बात कर रहा हूं? ठीक है, बताता हूं। 1975 का था वो साल। मैं आठवीं में पढ़ता था। जूनियर हाईस्कूल में छठी से आठवीं तक की क्लास ही हुआ करती थीं। इस लिहाज से मेरी क्लास बाक़ी दोनों क्लासों से बड़ी थी। जी हां, तबके सरकारी स्कूलों की पढ़ाई आज की तरह नहीं थी। प्रशासन में ज़रा सी भी गहमा-गहमी हुई - पूरा तंत्र सचेत हो जाता। इमरजेंसी का दौर शुरू हो चुका था। इमरजेंसी का कोई राजनैतिक अर्थ हम बच्चों की पहुंच से कोसों दूर था। हां, हमें अपने अध्यापकों के काम में मुस्तैदी और तत्परता ज़रूर दिखाई पड़ती थी। स्कूल समय से पूर्व और बाद में एक्स्ट्रा क्लासेज़़ चला करती थीं। तभी एक दिन ख़बर आई कि स्कूल का मुआयना करने डिप्टी साहब सदल-बल तशरीफ़ लाएंगे। साथ ही यह भी कि इस बार का डिप्टी थोड़ा केंड़ा है। मुआयने में कुछ भी नुख़्स निकाल सकता है। लिहाजा उन्हें प्रसन्न करने की तमाम ज़ोर आजमाइश की जाने लगी। आसपास के गांवों के सभी जूनियर हाईस्कूलों को यह ख़बर भेजकर चेता दिया गया। स्कूल की सफ़ाई और पढ़ाई पर जमकर ध्यान दिया जाने लगा। तमाम तरह के काम विभिन्न अध्यापकों के सुपुर्द कर दिए गए। कुछ प्रतियोगिताओं को आयोजित करने की योजना बनाई गई - लेज़म, पीटी, अंताक्षरी और प्रहसन प्रदर्शन {लघु नाटिका} आदि।
नाटक तैयार करने की ज़िम्मेवारी हरप्रसाद मास्साब की थी। हरप्रसाद मास्साब ने प्रार्थना सभा में इस बात की घोषणा कर दी कि जो कोई भी नाटक में भाग लेना चाहता है वो आधी छुट्टी से पहले उन्हें नाम लिखा दे। कई बालकों की तरह मैं भी नाम लिखे जाने वाली लाइन में था। मास्साब की उद्घोषणा आग्रहों से जितनी मुक्त थी उतनी ही आग्रहयुक्त थी उनके नाम लिखने की प्रक्रिया। उन्होंने जिन जिनके नाम लिखे उनमें ज़्यादातर बच्चे वो थे जो अपनी लच्छेदार भाषा में हरप्रसाद मास्साब को लुभा लेते थे। कुछ पढ़ने में होशियार भी थे औैर कुछ खेलकूद में और कुछ दूसरों की नक़ल उतारने में बहुत माहिर थे। इन्हीं बालकों में एक था नरेंद्र केंड़ा। वो वाकई बहुत केंड़ा था। उमर में वो हम सबसे बड़ा था। उसके हाथ की थाप अगर किसी की पीठ पर पड़ जाती तो वो कई दिनों तक सेंकता ही रहता। उससे हाथ मिलाते वक़्त उसका मिजाज़ देखना बहुत ज़रूरी होता था। कहीं ऐसा हो कि वो हाथ को ही पकड़कर मसल दे। एक बार की बात है, मैं झक सफ़ेद लट्ठे का पाजामा पहनकर आया था। मेरे लिए वह पाजामा नया बना था। नई चीज़ को पहनकर स्कूल जाना हर बच्चे के लिए अपने आपमें एक चार्म हुआ करता था, आज भी होता है। लट्ठा का कपड़ा बहुत मोटा था। नरेंद्र केंड़ा मेरे पास आया, बोला-
वाह क्या ज़बरदस्त पाजामा है!”
मेरे ही एक और सहपाठी दिनेश ने कह दिया-बहुत मोटा कपड़ा है बेटा। जाय कोई नाएं फाड़ सकतुई!”
अबे जा जा ऐसौउ नांय हतु। जाय तौ एकई बार में फाड़ दुंगो।”
तू का सारे दारासिंह है जो ऐसौ दम भर रौ है”
दारासिंह की ऐसी तैसी, अबई दिखांतूं”
अब नरेंद्र था और उसके हाथ में मेरा पाजामा। मुझे समझ ही नहीं आया कि आख़िर बात क्या हुई हां, हम सब तब सन्न रह गए जब नरेंद्र ने मोहरी की ओर से मेरा पाजामा घुटने तक फाड़ दिया। मैं तो समझ ही नहीं पाया था कि मैं आख़िर करूं तो क्या करूं। नरेंद्र मुझे दर्जी की दुकान पर लेकर गया था पाजामा सिलाया। मुझसे माफ़ी मांगी।
नरेंद्र केंड़ा के साथ-साथ दो और लड़कों को मुख्य किरदारों के लिए लिया गया। वो भी दिखने में लंबे तगड़े थे। एक और था रामपाल सिंह - वह बहुत ही ख़ूबसूरत बालक था। गोरा - चिट्टा। नाक-नक्श बहुत ही तीखे। रामपाल मेरी क्लास के कमज़ोर बच्चों में से एक था मगर एक ख़ूबी उसके साथ थी कि वो विधायक राजेंद्र सिंह का भतीजा था। क्या कहा, आपको इस बात का विश्वास ही नहीं होता। अब विश्वास तो करना ही पड़ेगा। उस ज़माने में पब्लिक स्कूलों का कोई ट्रेंड शुरू नहीं हुआ था। सबका एक ही स्कूल हुआ करता था। अखाड़ेबाज़ी का एक ही अड्डा हुआ करता था। सब एक ही जगह पढ़ते, एक ही जगह खेलते, लड़ते-झगड़ते। हां कुछ अध्यापकों का व्यक्तिगत स्वार्थ जब विधायक साहब की चौखट की धूल को लेने को मजबूर हो जाता तो ज़ाहिर है ज़मींदार साहब के लाढ़ले के लिए विशेष सुविधाएं जुट जातीं। स्कूल का हर शिक्षक रामपाल से बड़े ही प्यार और अदब से पेश आता था।
मैं बड़े ही बेअदबी के साथ नाटक के चुनाव से निकाल दिया गया। मुझे लगने लगा कि मेरे निकाले जाने के पीछे मेरे काले बदन की भूमिका रही है। इसका प्रत्यक्ष कारण भी था। मेरी बारी आने के साथ ही हरप्रसाद मास्साब ने कह दियाजा जा तू का नाटक करैगौ कारे-करूटे।” आसपास खड़े सभी बालक खिलखिलाकर हॅंस पड़े। मेरा सारा उत्साह फीका पड़ गया। मेरी बोलती भी बंद हो गई। मुझे एक सेकंड भी वहां रहना दूभर मालूम पड़ने लगा। ये बात यहीं तक ही रहती तो ठीक भी था। अगले ही दिन स्कूल में आते ही आते एक लड़के ने हाथ के अॅंगूठे को चिड़ाने के अंदाज़ में हिलाते हुए कहाले ले नाटक कल्लै।”
नाटक के अंदर तीन सीन थे। यह विवरण महाभारत की कहानी से था। कौरवों द्वारा निहत्थे अभिमन्यु को घेरकर मार डालने पर अर्जुन द्वारा की गई प्रतिज्ञा कि सूरज ढलने से पहले अगर वह जयद्रथ को नहीं मार पाया तो युद्धस्थल में ही चिता बनाकर भस्म हो जाएगा।
नाटक की रिहर्सल शुरू हो गई थी। नाटक में मौजूद सभी बच्चों को स्कूल के सभी छात्र और अध्यापक इज़्ज़त भरी निगाहों से देखते थे। नाटक वाले बच्चों को एक कमरे में इकट्ठा कर लिया जाता। संवाद कापी पर लिखा दिए गए थे। संवादों को ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाज़ रिहर्सल के कमरे की दीवारों और किवाड़ों को चीरकर हमारे कमरे तक आसानी से पहुंच जाती। संवादों को सुनकर मेरे पैरों में हलचल हो जाती जो मौक़ा पाते ही रिहर्सल वाले कमरे के इर्द गिर्द चक्कर लगाने लग जाते। मैं कमरे की सॅंधों से भी झांकता। कमरे की खिड़की थोड़ी ऊंची थी। उस पर चढ़ना बहुत मुश्किल काम था। मुश्किल था, असंभव नहीं मैंने और दिनेश ने सलाह की कि क्यों हम एक दूसरे के कंधों पर चढ़ते हुए अंदर झांककर देखें। मुझे याद नहीं कि यह सलाह किसकी ओर से आई थी पर यह तय ज़रूर हो गया।
हम कमरे की खिड़की के आसपास पहुंचे तो दिनेश बोला कि वो मेरे कंधों पर पहले चढ़ेगा। मैंने ज़रा सी भी आनाकानी करके उसकी बात मान ली। वो मेरे कंधों पर चढ़ गया। कंधों पर चढ़कर वो अंदर हो रही रिहर्सल का मज़ा लेने लगा। वो नाचने सा भी लगा। मेरे कंधे टूटे जा रहे थे; मगर वो था कि किसी भी सूरत नीचे उतरने को राजी ही नहीं हो रहा था। थोड़ा-सा और, थोड़ा-सा और कहते हुए वो मेरे कंधों को पीसे डाल रहा था। कोई दस मिनट तक अंदर का लुत्फ़ उठा लेने के बाद वो उतरा। मुझे अपने कंधों पर चढ़ाने की बारी में वो कहने लगा कि मास्साब जाएं। मैं जब नहीं माना और अपनी बारी लेने के लिए ज़िद करने लगा तो उसे हारकर अपने कंधों पर बैठाना ही पड़ा। दरअसल हम दोनों का क़रार लंबा था - रोज़ाना के लिए। मैं उसके कंधों पर चढ़ने लगा। वो बैठा हुआ ही था। मैंने दीवार पकड़कर अपना बेलैंस सॅंभाला भी था कि उसने सामने से रहे अंसारी मास्साब को देख लिया और वो मुझे गिराकर भाग गया। मैं मुँह के बल ज़मीन पर ओंधा गिर पड़ा। ठोड़ी पर गूंमड़ा उभर आया। मैंने सामने देखा कि अंसारी मास्साब अपने हाथ में लंबी सी संटी लेकर चले रहे हैं। मेरी अच्छी ख़ासी पिटाई हुई। मगर नाटक के प्रति लगाव किसी सूरत कम नहीं हो रहा था। संवाद रिहर्सल रूम में चल रहे होते, मगर मैं उन्हें अपने मन ही मन दुहरा रहा होता।
अब ज़रा कास्टिंग भी जान लें। रामपाल कृष्ण और नरेंद्र जयद्रथ था। अर्जुन भीमसिंह था जो अर्जुन से ज़्यादा भीम ही नज़र रहा था। तीन और बच्चे थे जो सिपाहियों{योद्धा} की भूमिका में कास्ट किए गए थे। हफ़्ते भर के अंदर नाटक अपनी शक्ल ले चुका था। संवाद धड़ाधड़ निकलकर रहे थे।हे अर्जुन! सामने देखो! सूरज छिपा नहीं बल्कि अपने पूरे तेज़ पर है, उठाओ अपना गांडीव और अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो!”
जयद्रथ वध का पूरा का पूरा दृश्य रोंगटे खड़ा कर देने वाला था। रामपाल कृष्ण की भूमिका में जॅच रहा था। नरेंद्र जयद्रथ के रौल में थर्राहट भरी आवाज़ इतनी ज़ोर से निकालता कि एक बार को अर्जुन की सांस ही थम जाती। वो ज़ोर का अट्टहास लगाते वक़्त अपनी पूरी ताक़त झोंक देता। रिहर्सल में चिता तैयार करते हुए अर्जुन के चेहरे पर आत्मविश्वास की जगह अनिश्चितता तो देखी ही जा रही थी बल्कि वो अपने संवाद भी ज़रूरत से ज़्यादा भूल रहा था। हरप्रसाद मास्साब कई बार तेज़ चीख़ पड़ते। और कई बार अपने बेंत को ही रसीद कर देते। ख़ैर नाटक तैयार हो गया।
अगले ही दिन डिप्टी साहब के सम्मान में यह नाटक खेला जाने वाला था। देर शाम तक रिहर्सल चलती रही थी। मैं अपने खेल के वक़्त में वहीं आकर बैठ गया था। दरअसल मेरा घर स्कूल के बहुत पास था। हम सब खेलने के लिए भी जूनियर हाईस्कूल में ही आया करते थे। उस दिन जब नरेंद्र अपने संवाद भूल रहा था। मैं उसके संवादों को बोल-बोलकर याद दिला देता। कई पात्रों के संवाद मुझे रट गए थे। मेरे बोलने पर एक दो बार तो हरप्रसाद मास्साब ने अचरज के साथ मुझे देखा मगर बार-बार बोलने पर उन्होंने मुझे डपट दिया –“ तिवड़िया तू भागैगौ कि नाएं।” यक़ीनन उन्हें पात्रों के संवाद याद होने पर एक चिंता तो रही होगी।
अगले दिन मैं सुबह ही सुबह जब शौच के लिए खेतों की ओर जा रहा था। मैंने देखा स्कूल का चपरासी जिसका नाम भी दिनेश ही था, नसैनी पर चढ़-चढ़कर कागज़ की रंग-बिरंगी झंडियां लगा रहा है - तिकोनी, रस्सी में बॅधी हुई। ये झंडियां बहुत ही ख़ूबसूरत लग रही थीं। रामप्रसाद हैडमास्साब हिदायत देते जा रहे थे। ऐसे लगाओ, यहां लगाओ, नहीं, यहां नहीं, यहां से कील उखड़ जाएगी। तभी देखा कि बशीर मास्साब साइकिल पर तेज़ पैडल मारते हुए चले रहे हैं। गुनगुनी ठंड में भी पसीने से तर-बतर हैं। मोहम्मद बशीर पास के ही गांव करथला में रहते थे।
हैडमास्साब ने उन्हें देखा। दुआ सलाम हुई।
सबेरे के पांच बज गए बशीर तुम्हारे?”
हैडमास्साब का करूं, रात में काउनै साइकिल के अगले पहिया की हवाई ही निकार दई।”
बशीर मास्साब भी टेंट लगवाने के काम में लग गए। हम सब बच्चों को 12 बजे स्कूल पहुंचना था। प्रतियोगिताओं की शुरूआत 12 बजे से होनी थी। मैं अपने घर में छज्जे पर कुछ काम करने के लिए बैठा था। घर में मेरे एक भाई की हिदायत मुझे मिल गई थी कि मैं 11 बजे तक अपना काम कर लूं। परीक्षा आने वाली है और स्कूल में जाकर मैं वक़्त फालतू बर्बाद करूंगा। अब मुझे नहीं मालूम कि मेरा ध्यान पढ़ाई में कितना लग रहा था और कितना स्कूल में होने वाली हलचल में। कोई साढ़े दस बजे का वक़्त होगा कि किसी ने मुझे दरवाज़े पर आवाज़ दी। मेरे कान खड़े हो गए।
हरप्रसाद मास्साब ने तू बुलवायौए” बुलाने आए लड़कों के झुंड में से एक ने कहा।
का बात है?” मेरे बड़े भाई ने उनसे पूछा।
लड़कों ने कंधा उचका दिए कि उन्हें कुछ नहीं मालूम। मेरी मां ने नीचे से ही आवाज़ लगाते हुए मुझे नीचे बुलाया। मैंने सुन तो सब कुछ लिया था पर मैं ये सोच रहा था कि आख़िर वजह क्या हो सकती है हरप्रसाद मास्साब के बुलाने की।
ख़ैर मैं लड़कों की पूरी पलटन के साथ स्कूल की ओर चला। हरप्रसाद मास्साब द्वारा बुलाना अपने आपमें किसी भी बालक के लिए बहुत बड़ी बात थी। मैं एक गर्वयुक्त अहसास के साथ जैसे ही स्कूल के प्रांगण में पहुंचा, जयद्रथ मिला, मेरा मतलब नरेंद्र, बोला -
यार गड़बड़ है गई है”
का भयौ?”
हरप्रसाद मास्साब बतांगे। तोय देख रहें।”
कहां हैं?”
हैड मास्साब के कमरा में”
मैं जब तक हैड मास्साब के कमरे की ओर जाता तब तक बालकों के झुंड ने मेरे आने की सूचना उन्हें दे दी थी। मास्साब लगभग दौड़ते हुए मेरी ओर रहे थे। वे बिल्कुल निरीह नज़र रहे थे। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर एक गहरी मुस्कान और आत्मतुष्टि के भाव मुझे दिखाई दिए।
आयगौ भैया
मैंने बड़े अदब से उन्हें नमस्ते की।
नमस्ते नमस्तेऔरआजा-आजा बेटा’ कहते हुए मुझे रिहर्सल के कमरे में लेकर गए। वहां पहुंचकर उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरा और कहा -
रामपाल बीमार पड़गौ है। बुखार आयगौ बायै। बाकौ रौल तोय करनौएं।”
मेरे चौंकने की बारी थी ......मेरे कुछ भी कहने से पहले वो फिर बोल उठे -
तू तौ कल्लेगौ। नाटक चार बजे है। तोय डायलौग तौ याद हैं ना। थोड़े से और याद कल्लियो। उन्नैंईं बोल दियो। बस है जायगौ काम।”
मुझे कृष्ण का रौल करना था जो नाटक का केंद्रीय पात्र था। मुझे अजीब सा लगा कि एक रौल को बिना किसी पूर्वाभ्यास के स्टेज पर खेलना है। कैसे होगा मैं कुछ नहीं समझ पा रहा था। पर जाने क्यों मैंने सुनते हीहां’ कर दी। अबहां’ करने के पीछे के भी कई कारण थे जिन पर गौर किए बिना इस विषय को आगे बढ़ाना कहानी के हिसाब से ठीक नहीं होगा। पहला नंबर तो ये कि जो अवसर इतने तरसने के बाद हाथ आया हो उसे कैसे गॅवाया जाय। एक बार मिला अवसर जाने फिर कब हाथ आए, और आएगा भी इस बात की भी क्या गारंटी है। नंबर दो, जो अध्यापक मुझे तरजीह नहीं देते थे वो सब आज इतने दयालु हो गए {यह विषय सोचने का है कि दयालु वे थे या मैं}, तो उनके इस आमंत्रण को ठुकराया कैसे जाय। नंबर तीन, स्कूल की प्रतिष्ठा का सवाल था जो भगवान कृष्ण के बीमार पड़ जाने की वजह से दॉव पर लगी थी और जिसे उबारने का ज़िम्मा मेरे हिस्से आया था।
हरप्रसाद मास्साब ने मुझे एक कागज़ पर पहले से ही उतारे गए संवादों के दो पर्चे पकड़ा दिए। मुझे एक ओर तो बहुत ही अच्छा लग रहा था मगर दूसरी ओर हरप्रसाद मास्साब के व्यवहार में आए एकाएक बदलाव को देखकर मैं एक अजीब तरह के भाव से ग्रसित हो गया। अब मेरे हाथ में संवाद के पर्चे थे और मैं था। रटता रहा। एक बार हरप्रसाद मास्साब ने बाक़ी सबके साथ रिहर्सल भी कराई जो महज औपचारिकता बनकर रह गई। कहां से कहां जाना है, कहां बैठना है, कहां खड़े होकर अपने सुदर्शन चक्र के साथ संवाद बोलने हैं - यह सब हरप्रसाद मास्साब ने इशारातन बता दिया और मुझसे कह दिया कि इसको मैं बार-बार दुहराता रहूं। संवाद के पर्चों को लेकर मैं रिहर्सल के उस कमरे में इधर-उधर घूमता रहा जिसमें कभी झांकने पर मेरी पिटाई हुई थी। कुछ बच्चे थे जो अब मुझे उसी खिड़की से देखने की कोशिश कर रहे थे। घूमने के पीछे मेरी एक मंशा शायद यह भी थी कि जो बच्चे मेरी मज़ाक उड़ाते थे किदेखो-देखो ये एक्टिंग करेगावो देख लें कि हरप्रसाद मास्साब ने उसे घर से बुलाकर ऐसा-वैसा नहीं, कृष्ण का रौल दिया है। ख़ैर......
वह घड़ी पहुंची जब स्टेज पर हमारे नाटक की बारी थी। स्टेज का संचालन किसी और स्कूल के मास्टर साहब कर रहे थे। हम लोगों ने अपने कास्ट्यूम्स पहन लिए थे। मेरे हाथ में सुदर्शनचक्र था जो हर समय मेरे साथ ही रहना था। कास्ट्यूम्स बदलते वक़्त हरप्रसाद मास्साब बार-बार एक ही बात कह रहे थे कि अच्छे से करना है। संवाद अगर कहीं भूल भी जाओ तो आगे चलना है। दर्शकों की अच्छी ख़ासी भीड़ जमा थी। मेरे पैर कांपने लगे। इतने लोगों के सामने स्टेज पर ...वैसे भी किसी स्टेज पर जाने का यह मेरा पहला मौक़ा था ....मेरा तो कोई अभ्यास भी नहीं हुआ था। संवादों के साथ मेरा तालमेल स्टेज पर जाने से पहले ही गड़बड़ाने लगा। कब कहां और क्या बोलना है... स्टेज के दूसरी ओर कब जाना है... स्टेज के बीचोंबीच कब आना है... मैं याद करने की जितनी कोशिश करता, उतना ही भूलता जाता। इस परेशानी को कुछ हद तक हरप्रसाद मास्साब ने मेरे चेहरे से पढ़ लिया। वो मेरे पास आए, मेरे सर पर हाथ फेरा और मुस्कराते हुए बोले -
तू तो सबसे अच्छा करेगा।”
जी” मैंने चेहरे पर एक नक़ली आवरण ओढ़ने की कोशिश की, जिसे पढ़ना हर किसी के लिए बहुत आसान था। मेरा सोच मेरे बस में नहीं था ...लो अब सबसे अच्छा भी करना है....रिहर्सल एक भी नहीं ...और सबसे अच्छा...कैसे होगा? मैंने अपना दिमाग़ झटक दिया - कुछ भी हो ये ज़िम्मेवारी अब मेरे ऊपर आई है तो इसे अच्छे से ही करना होगा। मैं एक बार फिर से नाटक के पूरे क्रम को याद करने की कोशिश करने लगा। चीज़ें साफ़तौर पर स्पष्ट होकर सामने आने लगीं। वक़्त कम था। कभी भी नाटक की घोषणा हो सकती थी। उधर मंच पर रामप्रसाद पंडितजीशिक्षा में नैतिकता’ विषय पर अपनी तक़रीर रख रहे थे। रामप्रसाद पंडितजी के बारे में एक ऐसा तथ्य मैं आपको बता सकता हूं जो शायद आपको अविश्वसनीय लगे, पर है जो सोलह आना सच। सुनाऊं, अच्छा तो सुनो - यह रामप्रसाद पंडितजी वो वाले नहीं है जिनका ज़िक्र हमने ऊपर किया है और जो स्कूल के हैडमास्टर थे। ये पंडितजी जात के सवर्ण थे, ब्राह्मण थे उधर रामप्रसाद हैडमास्साब जाटव थे यानी निम्न वर्ण। मास्टर को पंडितजी कहने का रिवाज नया नहीं हैं; किंतु यह रिवाज सिर्फ़ सवर्ण अध्यापकों के लिए ही था। रामप्रसाद हैडमास्साब को रामप्रसाद पंडितजी कभी भी कहकर नहीं पुकारा जाता था। उन्हें रामप्रसाद मुंशी कहा जाता था। मुंशी ही क्यों ये प्रश्न आपको परेशान कर सकता है। इसका मुख्य कारण ये है कि इससे सवर्ण और अवर्ण के बीच के भेद को बरक़रार रखा जा सकता था। दूसरे रामप्रसाद पंडितजी को पंडित शब्द की गरिमा पर ख़तरा भी महसूस होता था। पंडित - जो विद्वान होता है और विद्वान हो सकता है सिर्फ़ ब्राह्मण और कोई नहीं। मनुवादी व्यवस्था के सारे के सारे मापदंड अपनाए जाते जिन्हें रामप्रसाद हैडमास्साब सरीखे लोग {मेरे हिसाब से सही विद्वान} भी बिना किसी चू-चपड़ के सुनते रहते और चुप रहते। पता नहीं इस मुद्दे पर कुछ बोलते भी थे या नहीं - मुझे जहां तक याद है, मैंने इसके विरोध में उनकी कोई आवाज़ नहीं सुनी। हां, पूरी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के चलते व्यवस्था के प्रति उनकी झुंझलाहट अक्सर मैं देखता था। यह झुंझलाहट कई बार उन्हें उन लोगों के ऊपर भी होती थी जो विद्यालय के अंदर ऊंच-नीच को फैलाने के तमाम तरीक़ों को अपनाने की कोशिश करते। इसी प्रकार की बातों पर वो आर्यसमाज के बहुत से नियमों को उच्चारित करते, उन्हें विस्तार से समझाते।
आप भी सोच रहे होंगे कि मैं आपको कहां-कहां घुमा रहा हूं। मुझे दरअसल यह ज़रूरी लगा कि उन तस्वीरों को स्पष्ट करता चलूं जो दोहरे मापदंडों को अपनाने की आदी होती हैं। कथनी और करनी में जिनके अंदर अंतर स्पष्टतः परिलक्षित होता है। रामप्रसाद पंडितजी उन्हीं लोगों में थे जिन्हें कक्षा में पढ़ाने के नाम पर खर्राटेदार नींद आती थी मगर वही जब चार-पांच अध्यापकों के बीच बैठ जाते तो उनकी सारी नींद रफूचक्कर ही नहीं होती थी बल्कि वो देश की सामाजिक व्यवस्था को कोसते भी नज़र आते। ठहरिए, अभी मैं आपको इन्हींकी एक छोटी-सी घटना और सुनाता हूं। एक बार की बात है रामप्रसाद पंडितजी हमें हिंदी का कोई पाठ पढ़ा रहे थे। उन्होंने एक बालक को खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से बोलकर किताब पढ़ने को कहा। वह बालक जो भी उच्चारित करता, उसे बाक़ी सब बच्चे भी बोलते जाते। हिदायत ये दी गई कि पाठ ख़त्म होने के बाद फिर से पाठ को शुरू किया जाए, जब तक पंडितजी रोकें नहीं। बालकों के ज़ोर-ज़ोर से एक रिदम में बोलते ही पंडितजी को जॅंभाई आने लगी। थोड़ी ही देर में उनकी आंखें भी मुंद गईं। गर्दन कुर्सी की पीठ पर एक ओर झूल गई। पंडितजी गहरी नींद में सो गए। उनकी नींद भी लाजवाब थी - कितनी भी गहरी नींद होती, बच्चों की आवाज़ आनी बंद होते ही उनकी आंखें खुल जाती और भोंहें मटकाते हुए पूछते - ‘क्या बात है, पढ़ना क्यों रोक दिया?’ ख़ैर बच्चों की आवाज़ें ज़ोर-ज़ोर से रही थीं। इधर पंडितजी अपने सपनों की दुनिया में मस्त थे। उधर रामप्रसाद हैडमास्साब ने बरामदे से गुज़रते हुए कमरे में सो रहे पंडितजी पर एक दृष्टि डाली। वे कमरे में इस हिदायत के साथ गए कि बच्चे अपना पाठ बिना रोके पढ़ते रहें। उन्होंने बच्चों को खड़ा होने से भी मना कर दिया था। हैडमास्साब पंडितजी की कुर्सी के सामने वाली लाइन में फर्श पर सबसे आगे उस सीट पर बैठ गए जो उस बच्चे की थी जो पाठ को ज़ोर-ज़ोर से उच्चारित करने के लिए पंडितजी के बराबर खड़ा हो गया था। बालक ज़ोर-ज़ोर से बोलते जा रहे थे। अचानक हैडमास्साब ने सबको चुप करने के लिए अपने मुंह पर उॅंगली रखी। सभी चुप। सभी के चुप होते ही पंडितजी की नींद झटके से खुली और बोले- ‘क्या बात है, पढ़ना क्यों रोक दिया?’ आंखों के पूरे खुलते ही पंडितजी ने हैडमास्साब को अपने सामने बैठा पाया। उनकी हालत ख़राब। उनकी जीभ ही सूख गई। खिसियानी हॅंसी हॅंसते हुए वे अपनी सीट से उठ गए। उधर हैडमास्साब अपनी हॅंसी को दबाते हुए बोले -
काक चेष्टा वको ध्यानम्, श्वान निद्रा तथैवच....” श्वान निद्रा पर हैडमास्साब ने ख़ास ज़ोर देकर बोला था।
जी” पंडितजी की आखें चौड़ गईं।
पंडितजी कछू तबियत ख़राब है का?” हैडमास्साब ने पूछा।
नाएं हैडमास्साब ऐसौ कछू नाएं, रात में नेंक सोइ नाएं पायौ”
रामप्रसाद पंडितजी की सोने की आदत से हालांकि वो बाख़बर थे, फिर भी पूछा -
का बात है गई पंडितजी?”
पानी लगायो खेत में”
तो?” हैडमास्साब ने थोड़ा और टहोका।
जई मारें नेंक आंख लग गई”
स्टाफ़ रूम में थोड़ी देर जाइकें आराम कल्लेउ”
नाएं-नाएं अब ठीक है”
हैडमास्साब को भी अच्छी तरह मालूम था कि यह तो पंडितजी की रोज़ की ही बात है।
वही पंडितजी आज मंच पर थे। बच्चों की शिक्षा के स्तर में आई गिरावट पर अपना तफ़सरा रख रहे थे। उनके भाषण के ख़त्म होते ही हरप्रसाद मास्साब मंच पर आए। हमारे नाटक की बारी गई थी। नाटक की भूमिका बांधते हुए हरप्रसाद मास्साब ने नाटक के शुरू होने की घोषणा की। उनकी घोषणा मेरे कलेजे में एक तीर की तरह लगी। दरअसल इसका मुख्य कारण था मेरा बग़ैर रिहर्सल स्टेज पर जाना। दूसरे इस तरह किसी मंच से कभी भी मुझे कोई मौक़ा हाथ नहीं लगा था। थोड़ा-सा सब्र और करें तो एक साल पहले की घटना भी आपको बता दूं।
अंताक्षरी प्रतियोगिता थी। तीन विद्यालयों की तीन-तीन छात्रों की टीम थीं। हमारे विद्यालय से तीन छात्र तैयार किए गए। मैं भी उनमें से एक था। जिन मास्साब ने इसके लिए हमें तैयारी कराई उन्होंने हमें हर अक्षर पर तीन-तीन चौपाई, दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया या कोई अन्य कविता याद करने को कहा। ज़्यादा याद करने को उन्होंने व्यर्थ बताया और कहा कि एक अक्षर पर तीन से ज़्यादा तोड़ नहीं होता है। हरेक की बारी सिर्फ़ चार बार आनी थी। अंताक्षरी शुरू हुई। पहले राउंड में मुझे अक्षर मिला-‘ह। दूसरे राउंड का अक्षर भी रहाह। तीसरे राउंड में भी जब मुझेअक्षर मिल गया तो मुझे चिंता हुई कि कहीं चौथे और आख़िरी राउंड में भी जाए। मेरी चिंता फलीभूत हुई।ही आया। अब मैं क्या करूं - ये मेरी समझ में नहीं रहा था। मैंने भी साफ़गोई से काम लेना उचित समझा। कह दिया-
हमें तो मास्साब ने तीन ही तीन याद करबे कूं कह्योओ।”
मास्साब की हालत भी देखने लायक थी। उनके चेहरे पर मुझे काट खाने वाले दांत उग आए थे जो मुझे चेता रहे थे कि अब मेरी ख़ैर नहीं। दूसरी टीमों के सभी लोगों के चेहरों पर ख़ुशी की लहर थी वहीं दूसरी ओर हमारे स्कूल के अध्यापकों के चेहरे सुन्न पड़ गए थे।भोंदू हैकहते हुए मास्साब ने अपनी झेंप मिटाई। मेरी वजह से जाने वाले अंक से ही हमारी टीम हारी - यह मुझे बताया गया, जबकि मेरे बाद हमारी टीम का ही एक और छात्र भी चौथे राउंड केपर आए तोड़ को नहीं उठा पाया था। मगर मास्साब ने हारने का श्रेय मेरे हिस्से यह कहकर रखा कि अगर मैं अपना चौथे राउंड का तोड़ उठा लेता तो उस छात्र पर जिसने मेरी तरहपर अपनी जान तोड़ दी थी वह अक्षर आता। मास्साब का तर्क मुझे बिल्कुल समझ नहीं आया था। जानते हैं ये मास्साब कौन थे - ये थे रामप्रसाद पंडितजी।
लौटकर वहीं आएं जहां अभी नाटक होने वाला है। अर्जुन ने एंट्री ले ली। अभिमन्यु के मारे जाने पर उसका विलाप नहीं, उद्घोषणा हुई कि आज वह सूरज डूबने से पहले अगर जयद्रथ को ख़त्म नहीं कर पाया तो वो इसी रणभूमि में चिता जलाकर सबके सामने ख़ुद को ख़त्म कर लेगा। रणभेरी बज गई थी। हाथ में गांडीव थामे अर्जुन मंच के इधर-उधर घूम रहा था। मेरी एंट्री आई। हाथ में सुदर्शन चक्र थामे मुझे चेहरे पर शालीनता और स्थिरता लानी थी। मगर मेरे चेहरे पर दूर-दूर तक तो कहीं शालीनता थी और न हीं स्थिरता बल्कि एक हड़बड़ी थी, एक यांत्रिक भाव था। मूवमेंट्स को मैंने फ्री रखा जो दूसरे पात्रों के लिए परेशानी का सबब बन रहा था क्योंकि उन्हें अपने संवाद मूवमेंट्स के साथ ही बोलने थे, जैसे उन्होंने याद भी किए थे। एक-दो बार तो अर्जुन ने मुझे ठेल भी दिया क्योंकि मैं उसकी जगह पर खड़े होकर अपने संवाद बोल रहा था। मुझे मेरी सही जगह पता ही नहीं थी अतः वहां से छिटककर जब मैं दूसरी जगह जाता तो वहां से फिर ठेला जाता। बार-बार मुझे ठेला जाना - मतलब कृष्ण को ठेला जाना, मुझे चरित्र के प्रतिकूल लगता। मगर किया भी क्या जा सकता था। नाटक आगे बढ़ रहा था।
हे तात! प्रातःकाल से शाम होने को आई परंतु अभी तक मुझे अपनी प्रतिज्ञा पूरी होती नज़र नहीं आती....”
अर्जुन तुम अपना कर्म करो, आगे क्या होगा इसकी चिंता तुम मुझ पर छोड़ दो।”
मैं स्टेज से बाहर गया। हरप्रसाद मास्साब मेरे पास आए। मुझ पर शाबासी का हाथ रखा। नाटक का प्रवाह सही था। उन्होंने मुझे और आत्मविश्वास के साथ अपने संवाद बोलने को कहा। भूलने की स्थिति में मैं अपने आपसे उसी आशय का संवाद बोल दूं - यह हिदायत भी उन्होंने दी।
नाटक का आख़िरी दृश्य। शाम हो चुकी है, सूरज डूब चुका है। कृष्ण मंच के एक भाग में खड़ा है। दूसरे भाग में अर्जुन अपने लिए एक चिता तैयार कर रहा है। युद्ध एक तरह थम गया है। कौरव और पांडवों के कई वीर योद्धा खड़े हैं। जयद्रथ भी खड़ा है - अट्टहास लगाता हुआ। प्रतिज्ञा के अनुसार अर्जुन अब उसे नहीं मार सकता है क्योंकि मारने की प्रतिज्ञा सिर्फ़ सूरज डूबने से पहले की थी। अर्जुन ने भारी और थके मन से चिता पर आख़िरी लकड़ी रखी और कृष्ण की ओर देखा। मैं कृष्ण के रूप में मंद-मंद मुस्करा रहा था। अर्जुन ने अपना गांडीव कमर से उतारकर नीचे रखा। जयद्रथ के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ झलक रही थी। अर्जुन चिता की ओर बढ़ा कि कृष्ण के रूप में मैंने एक आह्वान किया जो मंच पर गूंज उठा -
हे जयद्रथ! देखो अभी सूरज छिपा नहीं है - वो तो बादलों के बीच गया था। हे धनुर्धर! उठाओ यह गांडीव और कर दो छलनी-छलनी सीना अर्जुन का।
जयद्रथ नहीं अर्जुनकिसी ने पीछे से फुसफुसाया।
एक बार तो सभी में चुप्पी छा गई। मगर दूसरे ही क्षण दर्शकों में हॅंसी का एक फव्वारा फूट पड़ा। डिप्टी साहब की हॅंसी का ठहाका साफ़-साफ़ सुनाई दे रहा था। मुझे लगा मेरे संवाद का जोश काम कर गया। इस संवाद को मैंने पूरी गहराई के साथ बोला था। वैसे भी यह संवाद पूरे नाटक का एक केंद्र बिंदु माना जाता था। मैंने अपना संवाद अभी ख़त्म किया भी नहीं था कि देखा हरप्रसाद मास्साब दाहिने विंग में से मुझसे कुछ कह रहे हैं। मैं विंग के पास आया तो मास्साब फुसफुसाए - ‘अर्जुन से कहना है गांडीव उठाने को
क्या?’ मैं उनकी बात सुन ही नहीं पाया था।
हरप्रसाद मास्साब फिर बोले - ‘अर्जुन से कहो कि जयद्रथ को मारे।
मुझे लगा कि कहीं कुछ ग़लत हो गया। मैंने हरप्रसाद मास्साब की प्रॉक्सी ज्यों की त्यों बोल दी। संवाद का सुर थोड़ा ऊंचा रखा।
अर्जुन से कहो कि जयद्रथ को मारे।”
सत्यानाश हो तेरा।हरप्रसाद मास्साब ने अपना माथा पीटा। मैंने उसे भी प्रॉक्सी समझा।
सत्यानाश हो तेरा अर्जुन” भोंहें चढ़ाकर मैंने अपना संवाद बोल दिया।
अरे सत्यानाश तेरा हो अर्जुन का नहींहरप्रसाद मास्साब लगभग चीख़ते स्वर में बोले। हालांकि उनका यह बोलना माइक ने पकड़ लिया था।
अरे सत्यानाश तेरा हो अर्जुन का नहीं” मैंने प्रकट तौर पर यह संवाद के रूप में जयद्रथ से बोल दिया। पर तभी मुझे ख़याल आया कि नहीं, यह संवाद तो पेपर में था ही नहीं। मुझे हरप्रसाद मास्साब की टिप्पणी याद गई कि कहीं भूल जाऊं तो उसी आशय का कोई संवाद बोल दूं।
सत्यानाश किसी का भी हो आगे बढ़ो......”
मगर आगे बढ़े कौन? मैंने वाक्य पूरा किया-“....अर्जुन
मगर अर्जुन मेरी ओर ताक रहा था। उसे समझ नहीं रहा था कि वो किस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करे। सच कहूं तो मेरी भी ख़ुद समझ में नहीं रहा था। हरप्रसाद मास्साब फिर से फुसफुसाए -
अबे अर्जुन से बोल कि जयद्रथ को मारे
सारी चीज़ें गड़बड़ाने लगी थीं। मुझे समझ में नहीं आया कि कौन किसे मारेगा। कुछ संवाद छूट गए थे। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। हरप्रसाद मास्साब की फुसफुसाहट भी पूरी तरह सुनाई नहीं दे रही थी। मैं मंच के उस हिस्से में आया जिसमें अर्जुन और उसकी चिता थी। मैं बोला -
अबे अर्जुन बोल तू जयद्रथ को मारेगा या नहीं मारेगा या जयद्रथ तुझे मारेगा? वैसे भी इस दुनिया में कौन किसको मारता है, सबको मारने वाला मैं हूं, जिलाने वाला मैं हूं।”
यह आख़िरी संवाद मुझे नाटक के अंत में बोलना था। सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया। अर्जुन ने गड़बड़ होते देख ख़ुद ही अपना गांडीव उठा लिया और जयद्रथ के पीछे-पीछे दौड़ता हुआ मंच के पार्श्व भाग में चला गया। मंच पर उपस्थित बाक़ी योद्धाओं को भी उन्हींके पीछे जाना था। आख़िर में कृष्ण को मंच पर रुककर नाटक का अंतिम संवाद बोलना था जो मैंने तो पहले ही बोल दिया था। अतः मैं भी सबके साथ भागकर मंच से रफूचक्कर हो गया और उससे पीछा छुड़ाया।
दर्शकों की हँसी के ठहाके और तालियां मुझे अपनी पीठ पर पड़ती मालूम दे रही थीं।
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