Monday, January 18, 2016

एकलव्य

एकलव्य
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एकलव्य
चुनौती बनकर सामने आया
द्रोणाचार्य वर्ण सत्ता की
कुलीन व्यवस्था की ईंटों को
चिनते हुए
तिरछी निगाहों देखते रहे

एकलव्य ने धनुष-कमान को हाथ लगाया
सर नवाते हुए
शिक्षा याचना की गुरु से
देते हुए राजतन्त्र की दुहाई
भोंहें तरेर दीं द्रोणाचार्य ने
शापित किया
धमकी दीं
और चढ़ते रहे सूरज की ऊंचाई......

एकलव्य ने घने जंगल में शरण ली
पहाड़ों को थामे हुए कन्धों पर
परिवार, कर्तव्य, सपने और जूनून को
सँजोए रखा
और एक दिन प्रकट हो गया
व्यवस्था के सूरज के विरोध में

महत्वाकांक्षा
अपनी जड़ें तक भुला देती है

नैतिक बल पैदा करता है
हमारी रीढ़ में ताक़त

लोभ-प्रलोभन का तिरस्कार
मदद करता रहा
एकलव्य को
सीधे और तनकर खड़े होने में

निरंतर अभ्यास
किसी को भी चोंका सकता है
हिला सकता है किसी की भी चूल्हें
कुलीन तंत्र की दुहाई में
खड़े हो गए द्रोणाचार्य
जो विकल थे
एकलव्य की प्रत्यंचा पर चढ़े तीर को देखकर
याद दिलाई उन्होंने
गुरु परम्परा को निभाने और न निभाने की शर्त
पांडित्य और राजपाट छूट जाने के डर में
मामूली ख़तरों का आभास भी
कमज़ोर बना देता है

एकलव्य का अँगूठा काटा गया
द्रोणाचार्य ख़ुश हुए
कमज़ोर हुई मगर सच की प्रामाणिकता

एकलव्य सौदागर नहीं
ज़िंदगी के कारोबार में
खुद की बाज़ी लगाने वाला
एक इन्सान था  
जो चनौती बनकर
सामने आता है
ज़िंदा रहती है जिसके बल पर
मानवीयता
हर युग में

हर दौर में ......!!    

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